Monday, 7 March 2016

छत्रपति शिवाजी महाराजके जीवनमें ब्राह्मणोंका स्थान !


‘कुछ वर्ष पूर्व जेम्स लेन नामक विदेशी लेखकद्वारा छत्रपति शिवाजी महाराजकी जीवनीपर एक आपत्तिजनक पुस्तक लिखा गया । इस पुस्तकके कारण कलह निर्माण हुआ एवं ब्राह्मण समाजको आलोचनाका लक्ष्य बनाया गया । कुछ समय पूर्व ही पुणेमें जात्यंध मराठा संगठनोंने ब्राह्मणद्वेषकी सीमाओंको लांघकर लाल महलके दादोजी कोंडदेवकी प्रतिमा मध्यरात्रिमें हटानेका दुष्कृत्य किया ।
‘छत्रपति शिवाजी महाराजके जीवनमें ब्राह्मणोंका स्थान क्या था’, इस बातको यदि ऐतिहासिक प्रमाणोंके आधारपर देखा जाए, तो ‘छत्रपति शिवाजी महाराजके नामका उपयोग कर ब्राह्मण-ब्राह्मणेतर विवादमें वृद्धि करना’, यह बात ‘शिवाजी महाराजका क्रूर परिहास है’, यह ध्यानमें आएगा ! इस सूत्रके समर्थनार्थ ‘अखिल भारतीय मराठा विकास परिषद’की ओरसे प्रकाशित ‘समाज जागृति पुस्तिका’से चुना हुआ लेखन आगे प्रस्तुत किया है । भूतकालमें नहीं थी, इतनी हिंदु एकात्मताकी आवश्यकता वर्तमानमें निर्माण हुई है; अतः ऐसे समयमें हिंदुओंको विभिन्न जनजातियोंमें विभाजित करना उचित नहीं होगा, इसलिए यह लेख प्रसिद्ध कर रहे हैं ।
५ अ. छत्रपतिके जीवनकालमें उनके गुणोंका वर्णन करनेवाले पहले तीन कवि ब्राह्मण ही थे !
अ. ‘छत्रपति शिवाजी महाराजके जीवनकालमें उनके गुणोंका मुक्तकंठसे गान करनेवाले पहले कवि अर्थात समर्थ रामदासस्वामी ब्राह्मण थे । उस समय उनकेद्वारा किया वर्णन देखें –
‘यशवंत, कीर्र्तिवंत । सामर्थ्यवंत, वरदवंत ।
पुण्यवंत आणि जयवंत । जाणता राजा ।।
आचारशील, विचारशील । दानशील, धर्मशील ।
सर्वज्ञपणे सुशील । सकळाठायी ।।
या भूमंडलाचे ठायी । धर्मरक्षी ऐसा नाही ।
महाराष्ट्रधर्म राहिला काही । तुम्हाकारणे ।।
पूरे भारतमें भ्रमण करनेवाले समर्थ रामदासस्वामीको छत्रपति शिवाजी महाराज जैसा महान व्यक्ति नहीं मिला, यह बात महत्त्वपूर्ण है । छत्रपतिके मृत्युके पश्चात संभाजी महाराजको लिखे गए एक पत्रमें समर्थ रामदास स्वामीने ‘शिवरायाचे आठवावे रूप । शिवरायाचा आठवावा प्रताप’, यही उपदेश किया ।
आ. छत्रपतिके जीवनकालमें उनके गुणोंका वर्णन करनेवाले कवि भूषण भी ब्राह्मण थे ।
इ. छत्रपतिकी सूचनानुसार संस्कृत भाषामें ‘शिवभारत’ नामक शिवचरित्र लिखनेवाले कवि परमानंद नेवासकर भी ब्राह्मण थे । इससे स्पष्ट होता है कि, महाराजके जीवनकालमें उनकी जीवनगाथा लिखनेवाले एवं महानता गानेवाले तीनों भी महत्त्वपूर्ण कवि ब्राह्मण थे ।
५ अ १. छत्रपति शिवाजी महाराजके साथ प्रखर एकनिष्ठा रखनेवाले ब्राह्मण!
१. छत्रपति शिवाजी महाराजका आग्रासे छुटकारा होते ही डबीर एवं कोरडे नामक महाराजके दो निष्ठावंत सेवकोंको औरंगजेबकी सेनाने बंदी बनाया । वास्तविक इन दोनोंने ही संभाजी महाराजको मथुरामें छिपाकर रखा था; परंतु उन्होंने यह बात अंततक औरंगजेबको नहीं बताई । अपितु लगभग दो माहतक औरंगजेबके कारागृहमें वे प्रतिदिन कोडेका प्रहार सहते रहे ।
२. ब्राह्मण व्यक्ति विश्वासू एवं एकनिष्ठ होते हैं, इस बातसे छत्रपति शिवाजी महाराज भलीभांति ज्ञात थे । सिंधुदुर्ग किलेमें छत्रपति शिवाजी महाराजद्वारा रखे गए जानंभट अभ्यंकर तथा दादंभट अभ्यंकरने मरते दमतक सिंधुदुर्ग किला नहीं छोडा था । छत्रपति शिवाजी महाराजके मृत्युके पश्चात औरंगजेबने सिंधुदुर्ग किला सर किया , उस समय ये दोनो भाई किलेमें मारे गए । ‘हम सिंधुदुर्ग छोडकर कहीं भी नहीं जाएंगे’, छत्रपति शिवाजी महाराजको दिए इस वचनका उन्होंने अंततक पालन किया ।
५ अ २. छत्रपति शिवाजी महाराजके जीवनकालकी संवेदनशील एवं अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटनाओंके साक्षीदार भी ब्राह्मण ही !
१. छत्रपति शिवाजी महाराजको कोंडाणा किला जीतकर देनेवाले बापूजी देशपांडे ब्राह्मण थे ।
२. पुरंदर किलेपर फत्तेखानके साथ लडते हुए छत्रपति शिवाजी महाराजकी अत्यंत महत्त्वपूर्ण सहायता करनेवाले किलेदार निलकंठ सरनाईक भी ब्राह्मण थे ।
३. महाराजके गुप्तचर विभागके पहले प्रमुख गुप्तचर नानाजी देशपांडे ब्राह्मण थे । आगे इस स्थानपर बहिर्जी नाईक आएं ।
४. त्र्यंबकेश्वरके वेदमुर्ति ढेरगेशास्त्री महाराजके क्षेम हेतु भगवान शिवजीके पास अनुष्ठान करते थे ।
५. लालमहलपर छत्रपति शिवाजी महाराजद्वारा मारे गए छापेके समय जिस साहसिक चढाईकी रचना की गई थी, उसके प्रमुख चिमाजी देशपांडे ब्राह्मण थे ।
६. चिमाजीके पिता लाल महलमें जिजाबाईके यहां अनेक वर्ष सेवामें थे; इसलिए उन्हें लाल महलकी रचनाका सब ज्ञान था; जिस कारण इस चढाईका नेतृत्व उनके हाथमें था ।
७. अफझलखानको मिलने हेतु जाते समय छत्रपति शिवाजी महाराजने गाय एवं ब्राह्मणका पूजन करनेकी ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध है । यह विधी कथन करनेवाले प्रभाकर भट्ट महाराजके राजोपाध्ये थे ।’
छत्रपति शिवाजी महाराजका ब्राह्मणोंके प्रति उत्कट आदरभाव एवं स्पष्टक्तता !
१. ‘छत्रपति शिवाजी महाराजने मसजिदोंको अग्रहार (इनाम) प्रदान करनेके ४-५ पत्र उपलब्ध हैं । केवल इन पत्रोंके आधारपर महाराज सर्वधर्मसमभावी हैं, यह बात निश्चित करनेकी उतावली की जाती है; परंतु ब्राह्मणोंको अग्रहार प्रदान करनेके ८२ पत्र उपलब्ध हैं, तो उसके आधारपर ऐसा ही निष्कर्ष क्यों नहीं निकाला जाता ?
२. ८.९.१६७१ को तुकाराम सुभेदारको लिखे पत्रमें छत्रपति शिवाजी महाराजने लिखते हैं , ‘बापूजी नलावडेने कलह कर तलवार निकाली एवं अंतमें अपने ही पेटमें छुरा घुसेडकर जान दी । यह घटना हो चुकी । मराठा होकर ब्राह्मणपर तलवार ऊठाई । उसका परिणाम उसे प्राप्त हुआ ।’ इस पत्रमें छत्रपतिका ब्राह्मणोंके प्रति विद्यमान आदर तो सामने आता ही है, साथ ही समस्त सरदारोंको महाराजके इस स्वभावका ज्ञान होनेके कारण महाराजका कितना आदरयुक्त भय था, यह नलवडे प्रकरणसे ज्ञात होता है । अनेक सरदारोंमेंसे बापूजी नलवडे नामक मराठा सरदारने एक ब्राह्मणपर तलवारसे वार किया, किंतु उसके उपरांत उसे यह भय लगा कि, ‘महाराजको यह बात ज्ञात होनेपर महाराज हमें कठोर शासन करेंगे ।’ इस भयके कारण उसने अपने पेटमें छुरा घुसेडकर आत्महत्या की । राजनेताओंका इस प्रकारका धाक प्रजाजनोंपर होना चाहिए ।
३. लगभग ८-१० पत्रोंमें, ‘किसी विशिष्ट नियमका पालन हों’, इसलिए महाराजद्वारा गौ एवं ब्राह्मणोंकी शपथ लेनेके लिए बाध्य किए जानेके उदाहरण हैं ।
४. अनेक पत्रोंमें ब्राह्मण-भोजके प्रबंधका उल्लेख है तथा ‘यह सर्व व्यय धार्मिक खातेमें दिखाएं एवं उसके विषयमें किसी भी प्रकारकी काटछांट न करें’, ऐसी कठोर सूचना महाराज देते हैं (सन १६४८) । इससे उनकी ब्राह्मणोंके प्रति भूमिका स्पष्ट होती है ।
५. अधिकतर ब्राह्मणोंको भूमि पुरस्कारके रुपमें प्रदान करते समय महाराजद्वारा उनके योगदानका कृतज्ञतापूर्वक उल्लेख किया गया है, उदा. ३ अगस्त १६७४ को मुरारी त्रिमल विभुतेको पत्रमें छत्रपति शिवाजी महाराज लिखते हैं , ‘स्वामीके सिंहासनाधिष्ठित होते समय आपने स्वामीके साथ रहकर अत्यधिक सेवा की । महान पराक्रम कर स्वामीका अनुग्रह प्राप्त किया । आपके स्वामीकार्यका मोल जानकर आपसे संतुष्ट होकर आपके योगदानके लिए यह पुरस्कार ।’
६. ‘छत्रपति शिवाजी महाराजको हिंदवी स्वराज्यमें यश प्राप्त हो’, इसलिए जिजाबाई अनेक ब्राह्मणोंसे अनुष्ठान करवाती थी, ऐसा स्पष्ट उल्लेख १८ फरवरी सन १६५३ को वेदमुर्ति गोपाळ भटको लिखे पत्रमें हैं । महाराज लिखते हैं, ‘वेदमुर्ति प्रभाकर भटकी ओरसे स्वामीने मंत्र उपदेश संपादित किया । स्वामीको आपने अपने आभ्योदयार्थ सूर्यप्रित्यर्थ अनुष्ठान बताया ।’
५ आ. छत्रपति ब्राह्मणोंके अधीन नहीं थे !
ब्राह्मण व्यवस्थापकके हाथों हुई चूकके विषयमें १९ जनवरी १६७५ को लिखे पत्रमें महाराजने ब्राह्मण व्यवस्थापकको भी फटकारा है । महाराज लिखते हैं, ‘ऐसे चाकरको ठीक करना ही चाहिए । ब्राह्मण है, इसलिए उसे छूट कौन देगा ? इसके अतिरिक्त भी आपके विषयमें कोई अपराध प्रविष्ट होगा , तो आपको छूट नहीं मिलेगी ।’ इससे स्पष्ट होता है कि, छत्रपति शिवाजी महाराजके मनमें ब्राह्मण जातिके प्रति आदर भाव था, तब भी वे ब्राह्मणोंके अधीन नहीं थे; अपितु साथ ही ऐसे १-२ पत्रोंकी पूंजी कर छत्रपति शिवाजी महाराजके पीछे छिपकर ब्राह्मणद्वेष बढानेकी भी आवश्यकता नहीं है । ‘ब्राह्मणोंको नष्ट करना, यह ही जिनका जीवनव्रत है’, वे अवश्य ब्राह्मणद्वेष करें; परंतु ऐसा करते समय छत्रपति शिवाजी महाराजके नामका उपयोग कर उस महान विभूतिको कंलकित न करें ।
५ इ. छत्रपति शिवाजी महाराजको स्वयं ‘गोब्राह्मणप्रतिपालक’ कहलवाते हुए संकोच नहीं होता, वहां उनके अनुयायी ‘गोब्राह्मण’ शब्दसे बातका बतंगड क्यों बनाते हैं ?
छत्रपतिके लगभग २०० पत्र उपलब्ध हैं । २०० मेंसे लगभग १०० पत्र उनकेद्वारा विभिन्न ब्राह्मणोंको कुछ ना कुछ दान दिए जानेके विषयमें अथवा अग्रहार दिए जानेके विषयमें हैं । मनुष्यका अंतःकरण जाननेके लिए पत्र एक अत्यंत मौलिक साधन है । विविध ऐतिहासिक घटनाओंमें छत्रपति शिवाजी महाराजने ब्राह्मणोंको अपने निकट किया । उनकी यह आस्था हमें उनके पत्रोंमें भी दिखाई देतीr है । महाराजको ‘गोब्राह्मणप्रतिपालक’ कहनेसे कुछ लोगोंका सिर चकरा जाता है । परंतु इ.स. १६४७ में मोरेश्वर गोसावीको लिखे पत्रमें छत्रपति शिवाजी महाराज लिखते हैं, ‘ब्राह्मणका आतिथ्य अभ्यागतको पावन करता है । महाराज गोब्राह्मणके प्रतिपालक हैं । गौका प्रतिपालन करनेसे अधिक पुण्यकी प्राप्ति होती है ।’ जहां स्वयं छत्रपति शिवाजी महाराजको अपने आपको‘गोब्राह्मणप्रतिपालक’ कहलवाते हुए संकोचकी भावना नहीं होती, वहां उनके अनुयायी गोब्राह्मण शब्दसे बातका बतंगड क्यों बनाते हैं, यह बात ध्यानमें नहीं आती ।
प्राचार्य शिवाजीराव भोसले कहते हैं, ‘‘महाराजका उल्लेख कोई ‘गोब्राह्मणप्रतिपालक’ नामसे करते हैं । मुझे इस उपाधिका आकर्षण लगता है । धरतीको समृद्धीका वरदान देनेवाला गोधन, साथ ही अपने तपोबलसे एवं अध्ययनसे समाजका स्तर ऊंचा करनेवाला ब्रह्मवेत्ता महाराजको रक्षणीय प्रतीत हुआ, इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है, परंतु शब्दोंकी खींचातानी की जाती है । अर्थका विपर्यास किया जाता है । क्या वर्तमानमें मान्यताप्राप्त ‘दुधका महापूर’ अर्थात ‘धवलक्रांति’की संकल्पना तथा कठीनतम परीक्षाद्वारा अधिकारियोंका चयन, ये प्रक्रियाएं न्यूनाधिक मात्रामें गोब्राह्मणप्रतिपालनका स्मरण करवानेवाली ही नहीं है ? ईक्कीसवी शताब्दीमें ब्राह्मण शब्द विद्वत्ता, बुद्धिमानता, विज्ञाननिष्ठा एवं स्वतंत्रप्रज्ञाका वाचक हो जाए, तो कितना अच्छा होगा !’’
५ ई. छत्रपति शिवाजी महाराजकी सहायता करनेवाले ब्राह्मण एवं विद्रोही मराठा !
अ. शिवचरित्रमें शिवछत्रपतिके आसपास जो भी महत्त्वपूर्ण मंडली थी, उसमें अधिकांश ब्राह्मण थे ।
आ. बंगळुरूसे छत्रपति शिवाजी महाराजकी सहायताके लिए शहाजी महाराजकी ओरसे भेजे गए दादोजी कोंडदेव एक अत्यंत विश्वासू ब्राह्मण व्यवस्थापक थे ।
इ. छत्रपति शिवाजी महाराजके मंत्रिमंडलमें आठमेंसे सात मंत्री ब्राह्मण थे ।
ई. डबीर, कोरडे, अत्रे एवं बोकीलकाका ये महाराजके सभी अधिवक्ता ब्राह्मण थे ।
उ. अफजलखानका अधिवक्ता कृष्णाजी भास्कर कुलकर्णी ब्राह्मण था, इसलिए आपत्ति उठाई जाती है; परंतु अफजलखानका अधिवक्ता ब्राह्मण था, उसीप्रकार छत्रपति शिवाजी महाराजका अधिवक्ता गोपिनाथपंत बोकील भी ब्राह्मण था ।
ऊ. ‘औरंगजेबकी सेनामें सहस्त्रों मराठा सरदार थे’, इस विषयमें मौन रखा जाता है ।
ए. प्रत्यक्षमें छत्रपति शिवाजी महाराजके अडतीस आप्तजन अफजलखानकी सेनामें खानकी सहायता कर रहे थे । छत्रपति शिवाजी महाराजको मिलनेके लिए अफजलखान आया, उस समय उसके गिने-चुने दस अंगरक्षकोंमें मंबाजी भोसले नामक छत्रपति शिवाजी महाराजके चाचाजी, तो पिलाजी मोहिते एवं शंकरजी मोहिते ये महाराजके दो चचेरे श्वशुर थे ।’
– श्री. सुनील चिंचोळकर (संदर्भ : अखिल भारतीय मराठा विकास परिषदकी ओरसे प्रकाशित , ‘समाज जागृति पुस्तिका’)

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